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“… और उर्दू मुसलमान तो हिन्दी हिन्दू हो गई”

 “कोई समझे तो एक बात कहूँ

इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं  “

ये लाइने मशहूर शायर ‘फिराक गोरखपुरी’ की हैं। फिराक गोरखपुरी अपने दिल को छू लेने वाली शायरी और बेहतरीन उर्दू के लिए जाने जाते थे। फिराक साहब उस दौर में लिखते थे जब हिंदवी का बटवारा तो हो चुका था लेकिन हिन्दी और उर्दू को उनका धर्म मिलना बाकी था। वैसे तो फिराक ( रघुपति सहाय) साहब धर्म से हिन्दू थे और अपने अंतिम सांस तक हिन्दू ही रहें। मगर उनके मरने के बाद उनकी भाषा को मुसलमान बना दिया गया।

 

फिराक साहब की कलम से निकले उर्दू का हर एक शब्द जैसे सीधा दिल के पार होता हो। सिर्फ फिराक साहब ही नहीं, बल्कि उर्दू के और भी शायर जैसे मिर्जा गालिब, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, अहमद फ़राज़, मुनव्वर राणा, डॉ राहत इंदौरी, और आज के दौर के मशहूर शायर तहज़ीब हाफी हैं। इनकी शायरियां और नज़्मों ने भारत-पाकिस्तान सहित एशिया के कई देशों के युवकों को अपना दीवाना बना रखा है। शायद इसकी वजह इन जादूगरों की कलम के साथ उर्दू की जुगलबंदी है।

हिंदवी से निकले उर्दू को शायरों की भाषा कहा करते थे। मगर आज बदकिस्मती से उर्दू सिर्फ मुसलमानों की भाषा बन कर रह गई है।

“हिंदवी का जन्म”

इतिहासकारों के अनुसार हिंदवी का जन्म दिल्ली में हुआ था। दिल्ली में हिन्दू और मुसलमानों की मिली-जुली संस्कृति के वजह से पुरानी हिन्दी (खैरबोली) में फारसी के कुछ शब्द जुड़ने लगे।  जिसने हिंदवी को जन्म दिया। हिंदवी को शरुआत में हिन्दुस्तानी और दहलवी भी कहा जाता था।

इसी बीच दिल्ली सल्तनत ने फारसी को अपनी आधिकारिक भाषा घोषित कर दिया जो मुगल साम्राज्य में भी कायम रही। 13 वीं सदी मे हिंदवी के पहले कवि आमिर खुसरौ हुए। जिन्होंने ढेर सारे लोकगीत, कविता और ग़ज़लों को लिखा। औरंजेब के शासक बनने तक हिंदवी सबकी मातृ भाषा बन चुकी थी। जिसके वजह से 18 वीं सदी मे हिंदवी को मुगल साम्राज्य मे मान्यता मिली। और पहली बार इसे ज़बान-ए-हिंदुस्तान कहा गया।

हिंदवी को पहली बार उर्दू सन 1780 मे ग़ुलाम हमदानी मुस्तफि ने कहा था, जिसका मतलब होता है “छावनी मे बोले जाने वाली भाषा”।

हिन्दू-मुस्लिम और बाहर के देश से आए सौदागर सभी इस भाषा का इस्तेमाल करते थे। तब ना तो हिंदवी का बटवारा हुआ था, नाही हिंदवी को उसका धर्म मिल था। तब हिंदवी सिर्फ हिन्दुस्तानी थी।

“हिंदवी का बटवारा और उर्दू का इस्लामिकरण”

भाषा हमारे विचारों को दूसरों को समझाने और दूसरों के विचार को समझने के लिए होती है। लेकिन ये हमारी पहचान भी होती है। भाषा हमारे देश, राज्य और कभी-कभी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण संयोग में हमारे धर्म को भी बताती है। कुछ ऐसा ही भारत मे 18वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के शुरुआत में हुआ। जब हिंदवी का बटवारा कर हिन्दी और उर्दू बनाए गए। हिन्दी को हिंदुओं की भाषा कहा गया और उर्दू को मुसलमानों से जोड़ दिया गया।

हिंदवी के बटवारे के पीछे दो कारण थे। पहला मुग़ल साम्राज्य में मुसलमानों और हिंदुओं के बीच की आपसी रंजिश और अपने वर्चस्व को स्थापित करने की नासमझ ख्वाहिश। और दूसरा अंग्रेजी हुकूमत की डिवाइड एण्ड रूल (फुट डालो राज करो) नीति।

सन 1750 के करीब हिंदवी का बटवारा होना शुरू हो चुका था। कुछ मुसलमान रचनाकार और सूबेदारों ने अपना वर्चस्व दिखाने के लिए हिंदवी के संस्कृत से लिए गए शब्दों को फारसी के शब्दों से बदलना शुरू कर दिया। और ठीक इसी तरह हिंदुओं ने संस्कृत का प्रयोग शुरू कर दिया।

डॉ तारिक रहमान अपनी किताब “फ्रॉम हिन्दी टू उर्दू- ए सोशल एण्ड पोलिटिकल चेंज” में इस काल को प्युरीफिकेशन मूवमेंट (शुद्धिकरण) कहते हैं। डॉ रहमान लिखते हैं कि इस शुद्धिकरण की शुरुआत मुस्लिम कवियों ने की जो अपने लिए एक अलग पहचान चाहते थे। जो बदलाव इस दौरान हुए उन्मे संस्कृत शब्दों को हटाना, भारतीय रूपकों को ईरानी और इस्लामिक रूपकों से बदलना शामिल था। इस दौरान हिंदवी के लगभग चार हजार शब्दों को बदल दिया गया, जिनमें नैन, प्रेम, मोहन जैसे शब्द शामिल थे। इन शब्दों का इस्तेमाल गानों, मुहावरों में तो होते  थे लेकिन इन्हे ग़ज़ल से निकाल दिया गया। ऐसा करने में मुख्य रूप से शाह हातिम, इमाम बक्श नासिख, इंशा उल्लाह खाँ जैसे रचनाकार थे। इनके बचाव में कहा गया कि ये सांप्रदायिक नहीं थे। इनको ये सारे शब्द पुराने, अप्रचलित और कठोर लगते थे। हातिम जैसे शायरों पर सिरजुद्दीन अली खान ‘आरज़ू’ का प्रभाव था। आरज़ू ने सालों से चली आ रही फ़रहंग को अपनी किताब नवादिर-उल-अल्फ़ाज़ में सही किया। उन्होंने इस किताब में फारसी और इस्लामिक सभ्यता से हिन्दुस्तानी शब्दों को बदला। और ऐसे 18वीं सदी के अंत तक भारत के रसूखदार घरों में दो भाषाओं ने जन्म लिया।

  “फारसीकृत उर्दू और संस्कृत से प्रेरित हिन्दी”

इसके बाद भी हिंदुस्तान के आमजनों की भाषा हिंदवी ही रही और यहाँ पर हिंदवी का बटवारा नहीं हुआ। आम हिंदुस्तानियों के बीच उर्दू और हिन्दी का विवाद सन 1857 के क्रांति के बाद अंग्रेजी हुकूमत की देन थी। 

उर्दू मे प्रकाशित महाभारत सन 1926 

सन 1837 मे उर्दू को अंग्रेजी हुकूमत ने सह-आधिकारिक भाषा का दर्जा दे दिया। इसी उपनेविशिक दौर मे मिर्जा गालिब और अल्लमा इकबाल जैसे मशहूर और काबिल शायर हुए जिनकी लाइने अमर हो गई। सन 1857 के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने मुसलमान वर्ग को लुभाने के लिए उर्दू को अरबी-फारसी लिपि में अपने स्कूलों में पढ़ना शुरू किया। और हिंदुओं को लुभाने के लिए हिन्दी को देवनागरी में पढ़ाने लगे। इसका आर्य-समाज ने विरोध किया और कहा कि उर्दू हिन्दवी से निकली है और देवनागरी ही इसकी लिपि होनी चाहिए। इस वक्त आर्य समाज को भी कुछ मुस्लिम वर्ग के लोगों का समर्थन मिल रहा था। पर ये एकता अंग्रेजों के कूटनीति के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाई। अंग्रेजी हुक्म की तामिल करते हुए अंग्रेजों के लिए काम करने वाले कुछ रसूखदार मुस्लिम और हिन्दुओ ने आर्य समाज का विरोध किया। सिर्फ भारतीय मूल के अंग्रेजी अफसर ही नहीं बल्कि उस समय के विद्वान, और आल इंडिया मुस्लिम लीग के संस्थापक सर सैयद अहमद खान ने भी हिन्दी और उर्दू के बीच के खाई को गहरा किया, अपने एक वकतत्व मे उन्होंने कहा, “उर्दू शरीफ़ों की भाषा है जबकि हिन्दी फूहड़ों  की”।

ठीक इसी तरह आधुनिक हिन्दी के पिता कहे जाने वाले भारतेन्दु हरिश्चंद्र ने कहा, “ धनी हिंदुओं के अय्याश बेटे अपने युवावस्था में जब वेशयाओं, रखैलों और दलालों के संगति  में होते है तो उर्दू बोलते हैं।

 जब देश के शिक्षित और लोकप्रिय नेताओं और लेखकों ने अंग्रेजों और अवसरवादी लोगों का साथ दिया तब जाकर उर्दू मुस्लिम और हिंदी हिन्दू हुई। 

“और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के सिवा,

राहते और भी हैं वस्ल के राहत के सिवा “

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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