जादवपुर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर कनक सरकार की समस्या क्या है? समस्या यह है कि वह देश की आधी आबादी को परंपरावादी नज़रिए से ही देखते हैं। उन्हें लगता है कि उन लड़कियों से ही शादी की जानी चाहिए, जो कुवारी हों। इस संदर्भ में वह “सीलबंद बोतल” और “सील पैक बिस्कुट के पैंकट” जैसे शब्दों के प्रयोग से भी नहीं हिचकते हैं।
सोशल मीडिया पर प्रोफेसर कनक के पोस्ट को पढ़ने के बाद युवाओं ने उन्हें आड़े हाथ ले लिया। चूंकि एक-दो दिन पहले ही ‘महिला आयोग’ द्वारा राहुल गाँधी के आपत्तिजनक बयान पर नोटिस भेजा गया था और इसी बीच कनक सरकार का प्रसंग वायरल होते ही ‘महिला आयोग’ कोलकता सरकार और जादवपुर यूनिवर्सिटी को नोटिस भेजने पर विवश हो गई।
विरोध ना होता तो?
अगर व्यापक विरोध नहीं होता तब यकीन मानिए उनके साथ काम करने वाले सहकर्मियों को भी कोई फर्क नहीं पड़ता। जी हां, कनक सरकार वैसे ही नौकरी कर रहे होते। कनक सरकार ने जो कुछ फेसबुक पर लिखा, हमारे समाज में अधिकांश पुरुष आधी आबादी के बारे में ऐसा ही सोचते हैं।

खैर, मामले को संज्ञान में लेते हुए जादवपुर यूनिवर्सिटी ने कनक सरकार को प्राध्यापक के पद से हटा दिया। भला हो सूचना के इस आधुनिक युग का जहां मौजूदा समय में कुंठित सोच का मुज़ाएरा पेश करने वाले लोग सवालों के घेरे में आ जाते हैं।
आधी आबादी को चुप्पी तोड़नी होगी
आधी आबादी जिस दिन समाज की कुंठित सोच का बही खाता खोलेगी या एक छोटा हिस्सा ही जब अपनी चुप्पी तोड़ देगा, उस दिन वास्तव में यह समाज बेगम रुकैया की कहानी “सुल्ताना का सपना” सरीखे दिखेगा, जहां सब लड़कियां ज़िन्दगी अपने तरीके से जी पाएंगी।
इन लोगों की समस्या यह है कि वह शिक्षित हुए लेकिन वास्तव में शिक्षित ही नहीं चेतना संपन्न भी नहीं हो सके हैं। एक निश्चित समय अंतराल पर आधी आबादी को लेकर इस तरह के संदर्भ हमेशा आते रहते हैं जिसे देखकर यही लगता है कि हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था की एक सीमा है।
वास्तव में हमारी शिक्षा व्यवस्था की सीमा यह है कि वह महज़ डिग्री के रूप में एक योग्यता है जो अच्छी नौकरी पा लेने तक ही सीमित है। यह मानवीय चेतना का विकास नहीं कर पा रही है कि शरीर, दिल, बोध अनुभूति, चिंता, चेतना और बुद्धि से युक्त वह आधी आबादी भी मनुष्य ही हैं। यह सधारण-सी बात नहीं समझ पाने का मतलब अशिक्षित रह जाना ही है।
पुरुषवादी समाज और उसकी रूढ़िवादी मानसिकता
यह इस बात का संकेत है कि आधुनिकता के दलहीज़ पर खड़ा पुरुषवादी समाज सभ्यता और संस्कृति का वास्ता देकर आधी आबादी को उसी परंपरावादी संकीर्ण दाएरे में खींचकर ले जाना चाहता है, जिसकी मुखालफत करके आधी आबादी ने अपनी अस्मिता की लड़ाई लड़ी है और अपनी पहचान रोज़ बनाती जा रही है।
कम-से-कम शुद्धता-अशुद्धता का जो नैतिकतावादी विमर्श बार-बार पब्लिक डोमेन में खड़ा किया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि पुरुषवादी समाज और उसकी रूढ़िवादी मानसिकता यह चाहती है कि आधी आबादी हमेशा अग्नि-परीक्षा देकर अपना क्रिया-चरित्र सिद्ध करती रहे।
अगर मौजूदा समय में कोई भी पुरुषवादी समाज यह सोच रहा है तो खबरदार! यह नव-आधुनिक लोकतांत्रिक समाज का दौर है। यहां आधी आबादी अग्नि परीक्षा नहीं देगी बल्कि गिरेबान पकड़कर तुम्हारी वर्जिनिटी का बही-खाता भी खोलेगी और अपनी वर्जिनिटी का हिसाब देना है या नहीं, वह खुद तय करेगी।